आज से कुछ दिन पहले की बात है
नया दौर और शायद नई शुरुआत है
मानवता को छलनी करता यह वक्त
दिव्याधरा पर सृजन कटु आघात हैं।
शब्दों के कंधों पर लदी है पीड़ा,
आँखों में सपनों की टूटी बरसात है।
विचार बिक रहे हैं सिक्कों के मोल,
संवेदना आज सबसे बड़ी मात है।
फिर भी कहीं राख के नीचे
चिंगारी अब भी मुस्कुराती है,
अंधेरों से लड़ने का साहस
कविता बनकर लौट आती है।
टूटे विश्वासों के मलबे से
एक नई सुबह जन्म लेती है,
जब सच की आवाज़ अकेली भी
झूठ की भीड़ से भिड़ लेती है।
लहूलुहान समय के माथे पर
उम्मीद का टीका सजता है,
हर गिरती हुई संवेदना से
एक नया मनुष्य गढ़ता है।
शायद यही है नई शुरुआत,
जहाँ शब्द फिर शस्त्र बनेंगे,
और मानवता के पक्ष में
हर अंश सच के साथ चलेंगे।
दुर्लभ कांटो सी व्याख्या का
हर सरल सुलभ आगाज़ है
मानवता की महत्वाकांक्षा का
यह एक शास्त्र विकराल है।
जहाँ प्रश्न भी प्रार्थना बन जाएँ,
और उत्तर कर्म का रूप धरें,
भीड़ नहीं, विवेक तय करे
हम किस ओर और क्यों चलें।
तभी समय के इस चौराहे पर
इतिहास खुद को दोहराएगा नहीं,
नई शुरुआत वही कहलाएगी
जब मनुष्य, मनुष्यता से घबराएगा नहीं।
अंत में विवेकाधीन स्वर में
कर्मपंती एक विचार गड़े
दिव्यधारा की प्रतिज्ञा का
सर्वसम्मति सत्कार करें।।
अति सुंदर प्रस्तुति महोदय
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