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Showing posts from December, 2025

यह धर्म सनातन हैं | गौरव पालीवाल (स्वरचित काव्य संग्रह) | किताबीNex प्रस्तुति

यह देश सनातन धर्म का है  यह देश हैं हिन्दूत्वं समर्पण का यह भूमि राम-राज्य शिखरों पर  यह धरा धर्म-निरपेक्ष से खिली हैं। यह देश सनातन श्वासों का देश है जहाँ समय भी नमन करता है मूल्यों के चरणों में, जहाँ आस्था कोई दीवार नहीं बल्कि संवाद है—पीढ़ियों के बीच। यह देश हिन्दुत्व के समर्पण का देश है अहंकार नहीं, करुणा का अभ्यास, दीप जलते हैं स्वयं के लिए नहीं दूसरों के अँधेरों को पहचानकर। यह भूमि राम-राज्य की कल्पना से ऊँची है जहाँ सिंहासन से पहले उत्तरदायित्व आता है, जहाँ शक्ति का अर्थ संयम है और न्याय का अर्थ करुणा। यह धरा धर्म-निरपेक्ष होकर भी पुष्पित है क्योंकि यहाँ हर विश्वास को मिट्टी की तरह समान जल मिलता है, और हर प्रार्थना आकाश में अपनी जगह पाती है। यह देश केवल नक़्शे पर नहीं, संस्कारों में बसता है— जहाँ परंपरा प्रश्नों से डरती नहीं और भविष्य जड़ों से कटता नहीं। यह देश सनातन चेतना का उजास है जहाँ युग बदलते हैं, मूल नहीं बदलता, जहाँ आस्था प्रश्नों से संवाद करती है, और संस्कृति समय के साथ चलना जानती है। यह देश हिन्दूत्व के समर्पण की साधना है जहाँ शक्ति में विनम्रता का वास है, जहा...

सर्वसम्मति सत्कार करें | गौरव पालीवाल (स्वरचित काव्य) प्रस्तुति | किताबीNex (द्वारा प्रकाशित)

आज से कुछ दिन पहले की बात है  नया दौर और शायद नई शुरुआत है  मानवता को छलनी करता यह वक्त  दिव्याधरा पर सृजन कटु आघात हैं। शब्दों के कंधों पर लदी है पीड़ा, आँखों में सपनों की टूटी बरसात है। विचार बिक रहे हैं सिक्कों के मोल, संवेदना आज सबसे बड़ी मात है। फिर भी कहीं राख के नीचे चिंगारी अब भी मुस्कुराती है, अंधेरों से लड़ने का साहस कविता बनकर लौट आती है। टूटे विश्वासों के मलबे से एक नई सुबह जन्म लेती है, जब सच की आवाज़ अकेली भी झूठ की भीड़ से भिड़ लेती है। लहूलुहान समय के माथे पर उम्मीद का टीका सजता है, हर गिरती हुई संवेदना से एक नया मनुष्य गढ़ता है। शायद यही है नई शुरुआत, जहाँ शब्द फिर शस्त्र बनेंगे, और मानवता के पक्ष में हर अंश सच के साथ चलेंगे। दुर्लभ कांटो सी व्याख्या का  हर सरल सुलभ आगाज़ है  मानवता की महत्वाकांक्षा का  यह एक शास्त्र विकराल है।  जहाँ प्रश्न भी प्रार्थना बन जाएँ, और उत्तर कर्म का रूप धरें, भीड़ नहीं, विवेक तय करे हम किस ओर और क्यों चलें। तभी समय के इस चौराहे पर इतिहास खुद को दोहराएगा नहीं, नई शुरुआत वही कहलाएगी जब मनुष्य, मनुष्यता से घब...